अमेरिका और चीन मे टकराव का इतिहास, news

अमेरिका और चीन मे टकराव क्यों?
अमेरिका व चीन के संबंध वैसे तो 200 साल वर्ष पुराने हैं इन दोनों देशों के संबंधों में कई बार उतार-चढ़ाव देखे गए, कई बार यह देश एक दूसरे के नागरिकों के ऊपर प्रतिबंध भी लगाए
 किंतु इन देशों का असल प्रेम चीन सोवियत संघ के युद्ध के बाद आपस में हुआ, यह युद्ध उसूरी नदी के बीच में द्वीप और देमेनेस्की को लेकर चीन और सोवियत संघ के बीच लंबे समय तक संघर्ष चला था, फिर अचानक चीन ने सोवियत संघ पर वर्ष 1969 के मार्च महीने में आक्रमण भी किया था। इस मुद्दे पर दोनों देशों के संघर्ष ने युद्ध का रूप ले लिया था। इसमें 31 रूसी गाईस की मौत हो गई थी, जिसके बाद युद्ध शुरू हुआ था।
 युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोप के देश चीन की मदद के लिए आगे आए,क्योंकि इन देशों का संबंध रूस से नहीं थे , इस समय अमेरिका और यूरोप के देश रूस को कमजोर करने के लिए चीन के साथ अपने संबंध को मजबूत किया
 इसके लिए अमेरिका और यूरोप के देशों ने चीन के साथ अपने आर्थिक संबंध बनाएं उनको यह लग रहा था कि अगर ऐसा हम करेंगे तो चीन हमारी कंट्रोल में रहेगा, और रूस के खिलाफ रहेगा 
 इसलिए अमेरिका के साथ पश्चिमी देशों ने अपने सभी कंपनियों एवं औद्योगिक इकाइयों को धीरे-धीरे चीन में स्थापित करने लगे, इन देशों को यह लग रहा था कि चीन की अर्थव्यवस्था इस प्रकार से अमेरिका और पश्चिमी देशों के हाथ में रहेगी, और अमेरिका और पश्चिम देश जैसा कहेगा चीन वैसा करने के लिए मजबूर रहेगा, चीन से अपने संबंधों को मजबूत करने के लिए पश्चिम देशों ने ब्रिटेन के ऊपर दबाव बनाकर 1 जुलाई 1997 को हांगकांग को शांतिपूर्ण तरीके से चीन को सौंप दिया,
 इस प्रकार यह सब क्रम अनवरत चलते रहे,पश्चिम देशों और अमेरिका को खुश करने के लिए चीन ने अमेरिका और पश्चिम देशों के कहने पर कई एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर भी किए, इन देशो ने चीन को हीरो बनाना शुरू किया,
 चीन इस समय अपने को साफ सुथरा छवि का देश दिखाने के प्रयास में लगा रहा, किंतु यहां पर अमेरिका और पश्चिमी देशों से एक बड़ी भूल हो गई कि चीन एक कम्युनिस्ट देश है, ना कि एक लोकतांत्रिक देश है
 चीन ने पश्चिम देशों और अमेरिका की जिन कंपनियों को चीन में लगाया गया उन कंपनियों में चीन के लोग कार्य करने लगे, चीन में जितनी कंपनियां थी वह अमेरिका और पश्चिमी देशों के थे, किंतु उसमें काम करने वाले सभी लोग चीन के थे, चीन ने इन कंपनियों में काम करने वाले महत्वपूर्ण पदों पर चीनी लोगों की एक सूची बनवाई, और इन सभी लोगों को चीन के खुफिया विभाग के साथ मिलकर पश्चिम देशों में अमेरिका की कंपनियों के टेक्नोलॉजी की चोरी और जासूसी के कार्य में लगा दिया, गया, यह कार्य पूरे चीन में राष्ट्रपति के आदेश पर गुप्त रूप से किया जा रहा था, इधर चीन के राष्ट्रपति के आदेश पर पश्चिम देशों और अमेरिका के कंपनियों के टेक्नोलॉजी चोरी हो रही थी उधर चीन के राष्ट्रपति पश्चिम देश और अमेरिका को खुश करने के लिए एक-एक कदम उनके कहने पर बढ़ा भी रहे थे, इसी बीच चीन ने पश्चिम देशों और अमेरिका को अपने पाले में खड़ा देखा तो उसने वन चाइना पाल्सी की नीति पर पश्चिम देशों और अमेरिका से अपनी सहमति ले ली, इसी समय अमेरिका और पश्चिमी देश चीन को इस बात का कानूनी रूप से वचन दे दिए कि चीन के द्वारा कब्जा किए गए देश और क्षेत्रों का अमेरिका और पश्चिम देश  कभी विरोध नहीं करेंगे, और चीन की वन चाइना पार्टी को स्वीकार करते हैं, आज आप खबर सुनते हैं कि अमेरिका की नेता नैंसी पेलोसी के द्वारा ताइवान की यात्रा की जाती है तो चीन इसका विरोध करता है और कहता है कि अमेरिका चाइना की वन चाइना पाल्सी का समर्थन करें,चीन के साथ अमेरिका ने वर्ष 1979 में पूर्व राष्‍ट्रपति जिमी कार्टर के समय में औपचारिक तौर पर राजनयिक रिश्‍तों की शुरुआत की थी। इसका नतीजा हुआ कि अमेरिका को ताइवान के साथ अपने रिश्‍ते तोड़ने पड़े और ताइवान की राजधानी ताइपे में दूतावास को बंद करना पड़ गया। लेकिन इस वर्ष अमेरिका ने ताइवान रिलेशंस एक्‍ट पास किया, जो ताइवान को समर्थन देने की गारंटी था। यह एक्‍ट यह भी कहता था कि अमेरिका को हर हाल में ताइवान की मदद करनी चाहिए ताकि वह अपनी सुरक्षा कर सके। वैसे चीन की वन चाइना पाल्सी का निर्माण 1949 में हुआ था,किंतु अमेरिका और पश्चिम के देश रूस के साथ चीन के युद्ध के 10 वर्ष 1979 मे बाद  कानून को मंजूरी दे दी,और चीन से अपने संबंध को बेहतर करने के लिए ताइवान को अकेला छोड़ दिया, और चीन की वन चाइना पालसी को स्वीकार कर लिया, ऐसा मात्र चीन को अपनी तरफ खींचने के लिए और रूस को कमजोर करने के लिए चाइना की वन चाइना पारसी को पश्चिम देशों और अमेरिका ने मंजूरी दे दी,
 उधर चीन टेक्नोलॉजी की चोरी के लिए पश्चिम देशों और अमेरिका की कंपनियों को धीरे-धीरे कमजोर करने लगा,और उन कंपनियों की टेक्नोलॉजी चोरी व  कॉपी करके चीन ने  सेम उसी तरीके से दूसरी चीनी कंपनियों को स्थापित कर दिया,
 चीन के ऐसा करते ही पश्चिम और अमेरिका की कंपनियों को भारी नुकसान हुआ,और वह धीरे-धीरे चीन में वह अमेरिका व पश्चिम देशो की कंपनीया कमजोर होने लगी, और चीन की कंपनियां धीरे-धीरे भारी मुनाफा में आने लगे,
 10 सालों तक यह क्रम चलता रहा क्योंकि अमेरिका पश्चिम देशों की एक मजबूरी थी कि अगर वह चीन को नाराज करेंगे, तो चीन रूस जाकर मिल जाएगा, यहां पर देखा जाए तो चीन अमेरिका और पश्चिमी देशों के ऊपर भारी रहा, धीरे-धीरे अमेरिका और पश्चिम देशों के व्यापारियों में चीन के घाटे को लेकर विरोध के स्वर उठने लगे,जिससे वहां की सरकारें भी चीन के खिलाफ अब धीरे-धीरे उठने लगे
 जब पश्चिम के व्यापारी और जनता चीन के विरोध में खड़े होने लगे,तब वहां की सरकारें धीरे-धीरे चीन के विरोध में आने लगे तब तक बहुत देर हो चुकी थी, और और इधर चीन अपने को दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक सुपर पावर बनाने की होड़ में दौड़ लगाने लगा, जिससे कि पश्चिम और अमेरिका के अस्तित्व के ऊपर खतरा बन गया, उधर रूस चीन के युद्ध के बाद रसिया को यह लगने लगा कि पश्चिम देश और अमेरिका चीन और रूस के बीच विवाद को लेकर राजनीति कर रहे हैं, तो रूस ने चीन के साथ शांतिपूर्ण तरीके से अपने सीमा विवाद का निस्तारण कर लिया जिससे कि चीन और रूस के बीच भी संबंध स्थापित होने लगा,यह बातें देखकर पश्चिम देश और अमेरिका के लोगों को चीन खटकने ने लगा
 धीरे-धीरे पश्चिम देशों और यूरोप के लोगों को भारी घाटे का व्यापार में सामना कर होने जाने लगा,  किंतु मामला तब देखना है जब चीन और रूस ने 2020 में एक जैविक हथियार का निर्माण किया,जिसका नाम करोना वायरस था उसका प्रयोग किया, जिससे कि अमेरिका और पश्चिम देशों में खलबली मच गई,
 लोगों के अनुसार कोरोना वायरस एक तरीके से आर्थिक सिस्टम को कमजोर करने की एक चीन और रूस का संयुक्त प्लान था, इस प्लान के मुताबिक अमेरिका और पश्चिम देशों को आर्थिक रुप से कमजोर करना ही प्रमुख मकसद था,
 अप्रत्यक्ष रूप से उसका कहीं भी रूस का नाम  वायरस में नहीं आता है, किंतु लोगों के कुछ सूत्रों के अनुसार यह बताया जाता है कि रूस और चीन ने मिलकर संयुक्त जैविक प्रयोगशाला में चीन के अंदर खोल रखे हैं,
 यह चीन और रूस का प्लान नंबर वन था,  करोना काल के समय अमेरिका में ट्रंप राष्ट्रपति थे, चीन और रूस का प्लान नंबर दो यह था, की यूक्रेन के ऊपर रूस उधर हमला करेगा, और इधर चीन ताइवान को कब्जे में ले लेगा इसके लिए दोनों देशों ने पूरे विश्व में कई युद्ध के मोर्चे खोल रखे थे, जहां अमेरिका और पश्चिम देश कई मोर्चे पर अपनी सेनाओं को लगा रखा है,
 इस प्रकार रूस और चीन के द्वारा संयुक्त प्लान बनाकर 2020 में कोरोनावायरस, फिर रूस यूक्रेन का युद्ध अब ताइवान पर कब्जे की तैयारी है,
 इन सभी प्लान में रूस और चीन आपस में मिले हुए हैं बातें तो यहां तक आती है, कि यूक्रेन युद्ध रूस के द्वारा शुरू करने के लिए चीन की तरफ से बहुत बड़ी आर्थिक मदद कर उसको दिया गया है, ओलंपिक खेलों के समय पुतिन सीधा कर जिनपिंग से मुलाकात करते हैं उसके बाद जाकर यूक्रेन में युद्ध की शुरुआत हो जाती है,
 भारत सरकार को भी यहां रूस और चीन की दोस्ती की और गठबंधन से सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि 70 वर्ष पुराना रूस में भारत का सबसे घनिष्ठ मित्र है, किन्तु आज के समय में   चीन का सबसे घनिष्ठ मित्र और भाई है, रूस मुख से चीन का कितना भी विरोध करें किंतु भीतर खाने में या दोनों देश आपस में दुनिया के इस समय सबसे घनिष्ठ भाई हैं, भारत सरकार भी रूस और चीन  गठबंधन और दोस्ती पर बहुत बारीकी से नजर रखे,इसका अध्ययन करना चाहिए नहीं तो आने वाले समय में भारत सरकार रूस बड़े धोखे पा सकती हो आप सभी साथियों को नमस्कार जय हिंद जय

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